Tuesday, September 30, 2008

क्या लिखूं अब तो कलम भी रुक गई है मेरी


क्या लिखूं अब तो कलम भी रुक गई है मेरी,
दिल पूछता है मुझसे यहाँ कौन हिन्दू है कौन मुसलमान,
मरने वाला तो हर कोई था बस इंसान,
मतलब नहीं है इन सबको अब इंसानियत समझाने का,
अब तो वक्त है दोस्तों कुछ कर दिखाने का,
मतलब मेरा ये नहीं की हम भी आनाक्वादी बन जाएं,
ये भी नहीं कहीं हम भी विस्फोट करा के आएं,
बस इतनी ही इल्तजा है मेरी सब से,
सब धरम अपना भूल कर इंसानियत को अपनाएं,
और इन मजहबी दुश्मनों को ये समझाएं,
कोशिशे कितनी भी कर लो टूट हम ना पाएंगे,
धर्म-मजहब किसी का भी नाम दो आतंकवाद को मिटाएंगे,
दिलो में दूरियां भले ही दिखती हो हमारे लेकिन,
देश और इंसानियत पर खुद को भी मिटाएंगे....................

SACHIN JAIN

7 comments:

मनुज मेहता said...

क्या लिखूं अब तो कलम भी रुक गई है मेरी,
दिल पूछता है मुझसे यहाँ कौन हिन्दू है कौन मुसलमान,

Sachin aacha likha hai, bhav poori tarah se abhivaykat huey hain. is rachna aur concern ke liye badhai. aap likhte rahen.

manuj mehta
www.merakamra.blogspot.com

seema gupta said...

क्या लिखूं अब तो कलम भी रुक गई है मेरी,
दिल पूछता है मुझसे यहाँ कौन हिन्दू है कौन मुसलमान,
मरने वाला तो हर कोई था बस इंसान,
"very good expressions"

regards

परमजीत बाली said...

बहुत ही बढिया लिखा आपने-

दिल पूछता है मुझसे यहाँ कौन हिन्दू है कौन मुसलमान,
मरने वाला तो हर कोई था बस इंसान,

बहुत सुन्दर!!!

mamta said...

बहुत ही अच्छा लिखा है । हर शब्द मे एक पैगाम है ।

रज़िया "राज़" said...

बस इतनी ही इल्तजा है मेरी सब से,
सब धरम अपना भूल कर इंसानियत को अपनाएं,
और इन मजहबी दुश्मनों को ये समझाएं,
कोशिशे कितनी भी कर लो टूट हम ना पाएंगे,
धर्म-मजहब किसी का भी नाम दो आतंकवाद को मिटाएंगे,
दिलो में दूरियां भले ही दिखती हो हमारे लेकिन,
देश और इंसानियत पर खुद को भी मिटाएंगे....................
bahot khoob,
bhagvan/khuda/rabba/ishvar ham sabhee ko aapke vicharon ka prasad/niyaz ata farmae. AAMEEN

Anonymous said...

Great work Sir..
keep it Up..

Regards
Akash Jain

Udan Tashtari said...

सही है-बेहतरीन लिखा!!