Saturday, May 19, 2012

Monday, October 31, 2011

जीवन के इस सफ़र में एक नई सी डगर है,

जीवन के इस सफ़र में एक नई सी डगर है,
नई सी एक मंजिल है, नया सा कुछ अहसास है,
हर वक़्त मुझे अब तो चाहत का है नशा सा,
कुछ हूँ मैं खोया सा कुछ हूँ मैं बहका सा,
बन रही है नई आशाएं और एक विश्वास भी है,
मंजिल मिल ही जाएंगी ये एक अहसास भी है....:)

Saturday, October 01, 2011

विरोध कुछ नया करने की प्रेरणा दे जाता है

विरोध कुछ नया करने की प्रेरणा दे जाता है
जिस तरह घर्षण से ही गाडी चल पाती है,

ना अनुभव ना श्रेष्टता ना भाषा इससमे काम आए,
मन में हिया अगर विचार अच्छे तभी कविता कोई लिख पाए,
ना छोटा ना कोई बड़ा सभी एक सामान पाए,
दर्द दूसरों का मससूस हो तभी कविता बन पाए,

Friday, July 29, 2011

आते जाते राहो में, दिल्लगी की बाहों में,

आते जाते राहों में, दिल्लगी की बाहों में
हमको ये ख्याल आता है, क्या इन जिंदगी की राहों में हमको भी कोई अजनबी मिलेगा
सोचते है हम कोई तो मिलेगा राहों में,पहला प्यारा होगा पहला नशा होगा,
पहली बार होंगे हम किसी की बाहों में,
कोई तो कहेगा हमें अपना, हम भी होंगे किसी का सपना,
कोई तो होगा जिसे होगा हमारा ख्याल, कोई तो पूछेगा हमसे ये सवाल " कहो ना प्यार है",
बस अब उसी का है हमको इंतजार, उस्सी के लिए है दिल बेकरार,
सोचता हूँ सोचते कट ना जाए, ये दिन, ये रात और ये रास्ते,
ना रह जाए मेरी सोच सिर्फ एक सपना,
यही सोच के दिल डरता है,
पर कहीं ना कहीं इस दिल को है यकीं ,
कहीं ना कहीं तो कोई होगा , जो देख रहा होगा हमारा सपना....

10 -03 -2002
सचिन जैन


आते जाते राहो में, दिल्लगी की बाहों में,
हमको ये ख्याल आया है,
इन जिंदगी की राहो में हमने भी एक अजनबी को पाया है,
सोच रहे है, पहला प्यार है, पहला नशा है, पहला गजब का ये अहसास है,
कोई कह रहा है हमें अपना, हम भी है किसी का सपना,
कोई है जिससे है हमारा ख्याल, जो पूछता है हमसे सवाल "कहो ना प्यार है"
उसी का ही था हमको बरसों से इंतज़ार, उसी के लिए था दिल बेकरार,
कट तो गए बहुत दिन, बहुत रात और बहुत रास्ते,
पर अब सपना सच होता लगता है, कोई अपना होता लगता है.........:)

30 -07 -2011
सचिन जैन

Friday, July 22, 2011

वो हमसे पूछे क्यों नहीं तुम कुछ कहते, हम उनसे पूछे तुम तो कुछ कहते,

वो हमसे पूछे क्यों नहीं तुम कुछ कहते, हम उनसे पूछे तुम तो कुछ कहते,
बस ऐसे ही चलती रहती अपनी बातें,कट जाती है ऐसे ही अपनी तो प्यारी रातें,

कुछ बताओ, कभी तुम कुछ बताओ, यही हम दोनों करते,
तुम कुछ पूछ लो, तुम कुछ पूछ लो कभी यह हम करते रहते,
ना वो पूछे ना हम पूछे, ना वो बताते ना हम बतातें,
दोनों ही इतराते जाते और मन ही मन हम मुस्काते जाते,
वो हमसे पूछे क्यों नहीं तुम कुछ कहते, हम उनसे पूछे तुम तो कुछ कहते,

कभी हम पूछे क्या करते हो दिन भर, कभी ये पूछे खाना खाया,
कभी पूछे घर में सब कैसे, कभी पूछे दूसरों की खबरें,
कभी हम पूछे कुछ तो लिखो, कभी वो पूछे कुछ तो पढ़ाओ,
लिखने पड़ने में रह जाते, बस यूँ ही हम बात करते जाते,
वो हमसे पूछे क्यों नहीं तुम कुछ कहते, हम उनसे पूछे तुम तो कुछ कहते,

लगता है की क्या बातें करे कभी, फिर भी हम करते जाते,
रोज ना जाने क्या क्या बातें करते, रुकते जाते करते जाते,
मुस्काते है, इठलाते है, बात करते करते कभी कभी रुक जाते है,
पर सच कहता हूँ मैं तो की, मन तो बस बाते करने को ही करता जाता है,
वो हमसे पूछ क्यों नहीं तुम कुछ कहते, हम उनसे पूछे तुम तो कुछ कहते,

कभी वो अपनी सुनती जाती, और मैं बस सुनता चला जाता,
कभी मैं अपनी कुछ सुनाता हूँ , और वो बस सुनती चली जाती,
ऐसे ही कट जाती रातें, हो जाती कितनी ही बातें,
बातें तो बस चलती जाती, दूरियां सब मिटती जाती,
वो हमसे पूछ क्यों नहीं तुम कुछ कहते, हम उनसे पूछे तुम तो कुछ कहते,

Wednesday, July 20, 2011

जमाने में मोहब्बत वो किया करते है,
जिन्हें किसी अजनबी पर हो खुद से ज्यादा यकीन,
हमें तो खुद पर भी अभी यकी नहीं आया,
किसी अजनबी पर आना तो बहुत दूर की बात है...
10-03-2002
Sachin Jain


और दूसरे पर यकीन वो किया करते हैं,
जो मोहब्बत के रस्ते पर बिना कुछ सोचे चल दिया करते हैं,
मोहब्बत वो राह हैं जिसमें दिमाग का काम नहीं,
दिल से सोचो दोस्त यकीन होगा उस अजनबी इंसान तभी..
20-07-2011
Dr. Akansha Jain

हमें भी मोहब्बत अब हुई है किसी से,
दिल अपना भी किसी ने बहकाया है,
खुद पर यकीं करना शुरू ही किया था अभी-अभी मैंने,
अब किसी अजनबी पर खुद से ज्यादा यकीं आया है..

20-07-2011
Sachin Jain

Tuesday, July 19, 2011

जब जब मैं इन हाथ की रेखाओं को देखता हूँ...

जब जब मैं इन हाथ की रेखाओं को देखता हूँ
इनमे तुम्हारा चेहरा नजर आता है
आड़ी तिरछी रेखाओं से एक सूरत बन सी जाती है
ये सूरत मुझको मेरे सपनो में भी आती है

लोग अक्सर तलाशते हैं तकदीर हाथ की रेखाओं मैं
मैं तो अपनी तकदीर यानी तुम्हे ही देखता हूँ बस
मुझे भी यकीन है रेखाओं में छुपी होती है takdeer
इससलिए बस इन्हें ही निहारता हूँ........बस इन्हें ही निहारता हूँ.....:)

सचिन जैन