Thursday, July 05, 2007

डर रहा है दिल आज मेरा......

आँखो मैं है मेरे सपने हजार,
यकीं है मुझे अपने सपनो पर भी,
कुछ भी कर सकता हूँ मैं अपने सपनो के लिए,
फ़िर भी एक डर सा है आज सपने टूट जाने का,
बहुत सपने टूटे आज तक मैरे,
पर वो मुझे ना तोड पाए,
ना रुका ना झुका आज तक मैं,
डगर से मुझे हिला ना पाए,
पर ना जाने क्योंं आज एक हल्चल है,
क्यों डर रहा है दिल आज मेरा,
क्यों हो रही है अजब घबराहट सी,
मन मैं उठ रहे हैं हजार तूफ़ां,
बदन में लगी है एक आग सी,
आवाज मैं भी है एक हिच्किचाहट है,
होठ भी आज कापं रहे हैं,
डर नहीं है आज भी मुझको खुद के डूब जाने का,
डर तो है बस अपने सपने टूट जाने का....

सचिन जैन
05-07-07

3 comments:

Udan Tashtari said...

वाह!! अंतर्द्वन्द को बहुत बखूबी शब्दों में समेटा है. बधाई.

Divine India said...

अंतर का भूचाल!!!
वाह क्या संभाला है शब्दों में भावना को…। मस्त!!!

Sar said...

hi dear,

good emotions and articulated words...i like this poem...seems like someone suffered has written it...anyways, keep it up...