Saturday, June 02, 2007

गर्व होता था मुझे हिन्दुसतानी होने पर,


गर्व होता था मुझे हिन्दुसतानी होने पर,
शर्म आती है मुझे हिन्दुस्तानी होने पर,
क्या-क्या नही हो रहा हमारे हिन्दुस्तान में,
लोग जला रहे लोगो को मजहब के नाम पर,

क्या ये वही धरती है जहाँ भगवान नें जन्म पाया था,
क्या ये वही देश है जो कभी विश्व गुरू कहलाया था,
क्या ये वही जगह है जहाँ से विश्व ने अहिंसा का संदेश पाया था,
क्या यंही के लोगो ने कभी सभी धर्मो को अपनाया था,

यही पर सब धर्मो के लोग दीवाली में दिये जलाते थे,
ईद में सब मिल बाँट कर सेंवईया खाते थे,
सब धर्मो के त्याहारो में खुशियां मनाई जाती थी,
होली में ये धरती रंगो से सतरंगी हो जाती थी,

अब इसी धरती पर लोग लडते है मजहब के नाम पर,
त्योहार भी आजकल डर-डर के मनाये जाते है,
नहीं बटती अब कहीं सेंवईया ईद में,
दिये पटाखे भी अब तो कम जलाये जाते है,

कभी था अपना हिन्दुसतान ऎसा जहाँ सब एक थे,
तब नारा लगता था हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई आपस में है भाई-भाई का,
जब होता था ऎसा, तब गर्व होता था मुझे,
जाने क्यूँ हुआ ऎसा अब शर्म आती है मुझे हिन्दुस्तानी होने पर,

गर्व होता था मुझे कभी हिन्दुस्तानी होने पर,
शर्म आती है मुझे अब हिन्दुस्तानी होने पर……………. सचिन जैन

2 comments:

परमजीत बाली said...

सचिन जी,बहुत सटीक रचना लिखी है।आज कल जो हो रहा है वह शर्मसार कर रहा है हम सबको।


कभी था अपना हिन्दुसतान ऎसा जहाँ सब एक थे,
तब नारा लगता था हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई आपस में है भाई-भाई का,
जब होता था ऎसा, तब गर्व होता था मुझे,
जाने क्यूँ हुआ ऎसा अब शर्म आती है मुझे हिन्दुस्तानी होने पर,

विष्णु बैरागी said...

भई बात समझ में नहीं आई । हम अपने आप को शरीक कर बात करना कब शुरू करेंगे । हिन्‍दुस्‍तान तो वैसा ही बन रहा है जैसा हम बना रहे हैं या कि बनने दे रहे हैं ।

हमें यदि शर्म आनी है तो इस बात पर आनी चाहिए कि हमने हिन्‍दुस्‍तान को ऐसा बना दिया या ऐसा बन जाने दिया ।

लेकिन हम अतीत की मरम्‍मत नहीं कर सकते । जो बीत गया सो बीत गया । उसका क्‍या रोना-गाना । आज से ही मरम्‍मत शुरू कर दें । किसी के भरोसे बैठे रह गए तो यह खुद पर शरम आने वाली एक और बात होगी । हम ऐसा कुछ कर लें कि हमारी आने वाली पीढियों को हम पर और अपने आप पर शर्म न आए ।

स्‍वर्ग तो मरने पर ही दीखता है साहेब ।