Saturday, October 11, 2008

मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं........



मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,
सर्वश्रेष्ठ हूँ मैं, हर पंथ (religion) को मैं सर्वश्रेष्ठ ही पाऊँ,

कभी मैं कृष्ण को अपना कहूं, कभी मैं राम का हो जाऊं,
कभी महावीर मुझे अपने लगे, कभी मैं बुद्ध की शरण में जाऊं,
देवी से मिन्नतें करू, साईं की भी कृपा मैं मांगू,
पैगम्बर पर भी मथ्था टेकू, इशु को भी गले लगा लूं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,

कभी मैं देखो मंदिर जाऊं, कभी ना मंदिर को अपनाऊं,
फिर भी मैं चर्च-पीर के आगे शीश अक्सर झुकाकर जाऊं,
गीता मुझसे तुम पढ़वाओ, चाहे रामायण का पाठ करालो,
कुरान-बाइबल को भी मैं गीता-रामायण जैसा ही तो पाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,


तुलसी स्वास्थ्यवर्धक है, इसलिए उसको पूज कर आऊं,
प्रक्रति पर हम निर्भर है, देव उनको मैं इसलिए बताऊँ,
अन्याय के खिलाफ लडो,रामायण-गीता में मैं ये सिखलाऊं,
गलत कुछ भी करने से पहले, मैं उस का डर दिल में पाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,

होली पर रंगों से खेलूँ और दीवाली दीप जलाऊं,
नवरात्रों में देवी को पूजूं, दशहरे पर रावन को फून्कूं,
फसले आने पर पर लोहणी और बसंत मनाऊं,
ईद-क्रिसमस भी मैं होली और दीवाली बनाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,


बुरा मुझे बुरा लगे, हिन्दू हो या कोई और हो,
भला मुझे भला लगे, हिन्दू हो या कोई और हो,
हिंदुत्व मुझे यही सिखाता, भले को अपनाकर बुरे से दूर जाऊं,
जीवन अपना इसलिए है की किसी के काम आऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,

गर्व है मुझको हिदुत्व पर जिसने मुझको ये समझाया,
बुरा ना कोई होता,दिल में सबके प्रेम है,
कुछ लोगो की चालें है ये, दिलो में जो ना मेल है,
इन चालों को मिटाता जाऊं, मैं बस प्यार बढाता जाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,

कोई कहे पचपन करोड़, कोई कहे एक सौ करोड़ देवता है,
चार वेद,अठारह पुराण,एक सौ आठ उपनिषद कुछ स्मृतियां भी हैं,
रामायण, महाभारत,गीता और न जाने कितने है,
वो एक रूप अनेक, अन्याय से लड़ और कर्म कर बस मैं तो ये ही बतलाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,

धरम के नाम पर मैंने भी बहुत सी रूढियां लिखी है,
सच है ये की कभी मैंने भी लोगो से खिलवाड़ किए,
धरम की ही सीख से मैं आत्मा की सुन पाऊं,
डरूं नहीं, झुकूं नहीं बस सही को ही अपनाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,

सभ्यता का बड़ा समुन्दर है मुझको ये है समझाने को,
वो है एक रूप अनेक, ना कोई बड़ा और ना कोई है छोटा,
कर्म-धर्म सब यहीं है फलने, किसी को भी चाहे अपनाऊँ,
उसको पूजूं या ना पूजूं, हर जान बस एक इंसान को ही पाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,

माँ-बाप मेरे हिन्दू है , मैं भी हिन्दू कहलाया,
सब धर्मो का आदर यहाँ, सब को सम्मान मैं दे पाऊं,
धर्म की सीख से ही भगवान् से पहले भी मैं इंसानियत को पूज पाऊं,
आज़ादी है मुझको यहाँ किसी को भी मैं अपनाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं मन की मैं करता ही जाऊं,

साम्प्रदायिकता के नाम पर हिन्दू का देखो जो विरोध जताते हैं,
धर्म का मतलब जीवन दर्शन, ये वो समझ न पाते हैं,
जिन लोगो को ज्ञात नहीं खुद के जीने का मतलब,
उनकी बातों को मैं लोगो क्यों अपने दिल से लगाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं मन की मैं करता ही जाऊं,

धर्म का अर्थ जीवन दर्शन है, ये कैसे मैं समझाऊं,
रास्ते इनेक मंजिल है एक, ये मैं कैसे दिखलाऊं,
सबकी अपनी कोशिश है उस तक पहुँच पाने की,
सबकी कोशिश को देखो मैं सही रास्ता दिखलाऊं,
मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं मन की मैं करता ही जाऊं...........


I liked the thoughts on this post http://hrudyanjali.blogspot.com/2008/10/blog-post_11.html and http://hrudyanjali.blogspot.com/2008/10/blog-post_7859.html
and after that wrote this.

The above picture have been designed by Madhur Kashayap, who is working with me in Freescale. I would like to thank him for let me using this picture for the post.

SACHIN JAIN

26 comments:

Satyajeetprakash said...

बहुत ही बढ़िया.
दरअसल सचिनजी, मैंने वो लेख एक प्रतिक्रिया में लिखी थी.
मैं सर्वश्रेष्ठ रहकर भी किसी को अपने से नीचा नहीं देखना चाहता हूं.
हिंदू धर्म सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन ना तो मुस्लिम ना तो ईसाई धर्म इससे कमतर है.
हिंदू धर्म ने हमें यहीं श्रेष्ठता सिखलाई है.
जहां तक मैं हिंदू धर्म को समझ सका हूं, जान सका हूं.
मैं कोई, ज्ञानी-ध्यानी, तपस्वी-योगी नहीं हूं.
तब भी मैं दावा कर सकता हूं कि मैं हिंदू धर्म के मर्म को समझता हूं.
अच्छी तरह समझता हूं.
तुलसी की झाड़ स्वास्थ्यवर्द्धक है, तो किसी ने इसे धर्म से जोड़कर पूजनीय बना है.
न्याय के खिलाफ आवाज उठाना सही है तो कृष्ण ने पार्थ से कहा यही तुम्हारा धर्म है.
मैं गंदे नाली को साफ कर रहा था तो एक बुढिया ने कहा, बेटा, तुम धर्म का काम कर रहे हो.
एक हिंदू के रूप में मैं ग्लानि से भर जाता हूं जब कोई हिंदू किसी धर्म या उसके धर्माबलंवियों को गाली देता है या किसी अन्य धर्म को नीच दिखाने की कोशिश करता है.
क्योंकि ऐसा करना हिंदू धर्म को ही अपना करना है.
भारत में जब एक ओर संतोषं परमं सुखम का मंत्र पढ़ा जा रहा था तो चार्वाक ने कहा-
यावत जीवेत, सुखम जीवेत, ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत.
और इस घोर भौतिकतावादी विचारधारा के प्रणेता चार्वाक को हमने ऋषि से सम्मानित किया.
चार वेद लिखे, काम नहीं चला, अठारह पुराण लिख लिए, काम नहीं चला, एक सौ आठ उपनिषद लिख लिए काम नहीं चला. स्मृतियां लिखी, रामायण लिखे, महाभारत लिखे, गीता लिखे, इनमें कौन है हिंदुओं का धर्मग्रंथ. सभी हैं और भी लिखते जाओ सबको शामिल कर लेंगे.
बाइबिल और कुरान को भी उतना ही सम्मान देंगे जितना गीता और रामायण को.
कौन को हिंदुओं के इष्टदेव, सुना था, हिंदुओं के पनपन करोड़ देवता हैं, अब बढ़कर एक बीस करोड़ के करीब हो गए हैं. पैगंबर और ईशुमसीह को भी इसमें शामिल कर लो, कोई बुराई नहीं.
कभी सप्तर्षि हुए, आज आचार्यों और ऋषियों की श्रृंखला काफी बड़ी हो गई है. अनगिनत हैं.
कितना विशाल है हिंदुधर्म.
इसलिए मेरे हिंदू होने पर मुझे गर्व है.
एक हिंदू के रूप में मुझे मुझे राम की स्तुति और राम की आलोचना दोनों सुनने की ताकत है.
सबसे बड़ी ताकत रामपर सवाल उठाने और चर्चा करने की मेरी स्वतंत्रता है.
यही वजह है कि मैं हिंदू धर्म को श्रेष्ठ मानता हूं, साथ ये भी कहता हूं कि और कोई दूसरा धर्म इससे हीन या कमतर नहीं है. श्रेष्ठ बनकर सबको श्रेष्ठ देखने की अभिलाषा हीं हिंदुत्व है.
हिंदूधर्म ने भगवान बुद्ध और महावीर को भी विष्णु का अवतार माना.
हर मत हर संप्रदाय को स्वीकारा, जो जिस रूप में आया, उसी रूप में.
यही मेरा हिंदुत्व है और इसलिए मैं हिंदू हूं. और मुझे अपने हिंदू होने का गौरव है.

श्रीकांत पाराशर said...

Bahut badhia. Hindutva ki udarta, vishalta,sahishnuta ka sundar varnan kiya hai aapne.

Anil Pusadkar said...

वाह बहुत बढिया,काश सभी ऐसा सोचने लगे। पहली बार आपको पढा अच्छा लगा।

नदीम अख़्तर said...

बहुत ही अच्छी कविता लिखी है आपने, इस कविता के शब्दों का भाव वर्तमान भारत के लिए स‌बसे ज़्यादा प्रासंगिक है. मैं ईश्र्वर स‌े प्रार्थना करता हूं कि हम स‌भी भारतीयों के मन में स‌चिन जी जैसा ही भाव भर दे।

neeshoo said...

सर्व धर्म संभाव की भावना को सचिन जी बहुत ही बेहतरीन ढ़ग से प्रस्तुत किया । ऐसी सोच को सलाम । आपका लेखन बहुत ही प्रभावित कर रहा है। धन्यवाद बधाई

Madhur Kashyap said...

जानूं मैं कि आत्मन के बोध से इश्वर में समा जाऊं
चाहूँ मैं कि ना हिंदू ना मुस्लिम ना ही इसाई कहलाऊं
जानूं मैं कि ख़ुद को जान लूँ तो खुदा को पाऊं
चाहूँ मैं कि ना हिंदू ना मुस्लिम ना ही इसाई कहलाऊं
जानूं मैं कि परछाईं को थाम इशु का सहारा पाऊं
चाहूँ मैं कि ना हिंदू ना मुस्लिम ना ही इसाई कहलाऊं
जानूं मैं कि साथ अंधेरे के रौशनी से पार जाऊं
चाहूँ मैं कि ना हिंदू ना मुस्लिम ना ही इसाई कहलाऊं
जानूं मैं कि हर धर्मं चाहे ख़ुद से बाहर आ जाऊं
ताकि ना हिंदू ना मुस्लिम ना ही इसाई कहलाऊं

विवेक सिंह said...

गर्व तो किसी को तब हो जब उसने कुछ किया हो . आपके हिन्दू होने में आपने क्या किया है ? कौन हिन्दू होगा कौन मुसलमान यह तो ईश्वर ही तय करता है . हाँ अगर आपने कोई दूसरा धर्म छोड कर हिन्दू धर्म को अपनाया है तो आप अपनी करनी पर गर्व कर सकते हैं .

SACHIN JAIN said...

Vivek ji garv mujhe khud par nahi hai, garv hai mujhe Hindutva par, uski vishalta par, usski mahanta par, aur garv hai mujhe apne bhagya par jo maine iss dharm me janm me lie..........

rekha said...

mr sachin jain are not hindus. jain religioun is more older then hindusim. you can this things to the scholars also. so plz do remove the poem may hindu hu. as jain are or were never part of hindus. there are JAIN. the most oldest religion of BHARAT DESH

SACHIN JAIN said...

Rakha Ji, pata nahi ye desh kab sudhrega, man bahut vichlit ho jaata hai jab main aisi baate sunta hoon, Jain are different, Hindu are different, What you know about about jainism or hinduism nothing but you have to talk the rubbish.......

I am here talking about the Hindutva i.e. superior to all religion, cast etc,

I am truly saying here because of your type of people I have left going to Jain temples long time back and also I do not like most of the jain activities, are we going to be another Minority cast in india.....

Suresh Chandra Gupta said...

काश दूसरे धर्म भी ऐसा ही सोचते, पर उनके अनुसार तो केवल उन का ही धर्म सही है, और हिंदू धर्म ग़लत. कुछ लोग तो इस धर्म के अस्तित्व को ही नकारते हैं.

Deepak said...

couldn't understand every word, m a little weak in Hindi [:D] but i got the larger meaning.

I completely agree with you..
Hinduism is the only religion in the world that accepts "other ways" for a man to achieve salvation or mukti. All other religions like christianity and islam propagate that it is a sin to follow any other path to God. I feel proud to say that I am a practicing Hindu. Even though i don't observe fasts, and don't believe in all the superstitious things.. Hinduism gives me the freedom to reason, question and derive my own meaning from the laid down principles. I also think our rich culture, knowledge through mythology, classical music etc are an integral part of Hinduism.

This world would be a far better place if every single person adopts Hinduism.

SACHIN JAIN said...

Deepak nice thoughts but this I did not like
This world would be a far better place if every single person adopts Hinduism..........

Everybody have rite to believe but they does not have rite to interfere in others, it is what Hindusim taught me,

अनुनाद सिंह said...

हिन्दू धर्म में वह सब कुछ है जो उसे सनातन और सर्वदेशीय धर्म बनाता है.

उसकी प्रार्थना है:
असतो मा सद गमय (असत्य से मुझे सत्य की और ले चलो )
तमसो मा ज्योतिर्गमय (अन्धकार से मुझे प्रकाश की और ले चलो )

सर्वे भवन्तु सुखिन: (सभी सुखी हों )

वह चरमपंथी नही हो सकता; मध्यमार्ग ही उसका आदर्श है :
'अति सर्वत्र वर्जयेत ' (अति से सदा दूर रहना चाहिए )

हिंदू धर्म का कोई एक 'पैगम्बर' नही है ; उसकी कोई एकमात्र 'किताब' नही है ; उसका ह्रदय
विशाल है; मस्तिष्क खुला है ; दृष्टि देश और काल के परे तक पहुँचने वाली है . इसलिए कृष्ण भी उसके भगवान है, मार्क्स भी हैं और गांधी भी. वह गीता को भी धार्मिक पुस्तक कहता है तो गणित की एक पुस्तक भी उसकी 'धार्मिक' पुस्तक है. इसलिए आश्चर्य नहीं कि उसने अपने धर्म को कोई नाम नहीं दिया. (हिन्दू शब्द तो 'मुसलमानों' का आविष्कार है)

वह 'वसुधैव कुटुम्बकम' को मानता है. वह सबमे एक ही परमात्मा का अंश देखता है और कहता है :
तत्वमसि (तुम 'वह' हो - तुम परमात्मा हो ). वह केवल मानव ही नही वरण पशु-पक्षियों और वनस्पतियों के भी हित की चिंता करता है. वह 'अहिंसा' को सबसे बड़ा धर्म मानता है. केवल कर्म से ही नही , मन और वाणी से भी अहिंसा .

वह किसी को अन्तिम सत्य नहीं मानता ; वह सदा सत्य का अनुसंधान कराने में विश्वास रखता है . 'नेति नेति ' (यह नही , यह नही ) कहकर वह तर्क वितर्क करता है. वह मूर्ख नही है की किसी भी अनर्गल प्रलाप को 'अन्तिम सत्य' मान बैठे. वह प्रश्न करने में विश्वास रखता है. वह 'प्रश्नोपनिषद ' रचता है ; नचिकेता के रूप में प्रश्न करता है; यक्ष के रूप में प्रश्न करता है ; अर्जुन के रूप में प्रश्न करता है. और तो और वह 'धर्म क्या है' इस पर भी बार-बार दृष्टिपात करता है. इसके आगे जाकर बार-बार प्रश्न करता है कि ' परम धर्म क्या है?' कोई धर्म के लक्षणों की बात करता है. कोई उसके दस लक्षण गिनाता है, कोई तीस .

वह सत्य की शक्ति पर विश्वास करता है (सत्यमेव जयते ) ; उसका विश्वास है की जब-जब धर्म का नाश होगा और अधर्म का उत्थान होगा - कोई न कोई महापुरुष अवतार लेगा . वह असत्य पर सत्य की विजय को मानने वाला है. वह एक होकर सहकार करने की शिक्षा देता है - सहनावातु, सहनोभुनक्तु सह वीर्यं करवाहहै . वह ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: रटने वाला जीव है.

लेकिन 'कट्टर' मजहब उसे 'कमजोर' मानकर उस पर आघात करते हैं. उसे मिटटी में मिलाने पर लगे हैं. ऐसे में उसे अपनी सुरक्षा की चिंता भी करनी चाहिए जिसे अभी तक वह अनदेखा करते आया है.

Shastri said...

मेरे मन में जो कुछ था वह अनुनाद जी ने लिख दिया है एवं मैं उसका अनुमोदन करता हूँ

-- शास्त्री

-- हिन्दीजगत में एक वैचारिक क्राति की जरूरत है. महज 10 साल में हिन्दी चिट्ठे यह कार्य कर सकते हैं. अत: नियमित रूप से लिखते रहें, एवं टिपिया कर साथियों को प्रोत्साहित करते रहें. (सारथी: http://www.Sarathi.info)

अविनाश वाचस्पति said...

उम्‍दा ख्‍यालात।

COMMON MAN said...

sarve bhavantu sukina: hindoo hi kah sakta hai

Arvind Mishra said...

बहुत सशक्त और सटीक अभिव्यक्ति -हिन्दू सरीखी उदारता विश्व में कहीं द्रष्टिगत नहीं !

Hans said...

Great thoughts.

Hans said...

dont you think hindutav se bhi bada ek dhrama hai, insaniyat ka??

देवेन्द्र कुमार मिश्रा said...

सब धर्मो का आदर यहाँ, सब को सम्मान मैं दे पाऊं,
धर्म की सीख से ही भगवान् से पहले भी मैं इंसानियत को पूज पाऊं,
सचिनजी,
वाह बहुत बढिया,काश सभी ऐसा सोचने लगे। पहली बार आपको पढा अच्छा लगा।

Mrs. Asha Joglekar said...

हिंदु धर्म यही सिकाता है कि सब धर्मों का आदर करो ।मनुष्यमात्र को आदर दो ।
धर्म का अर्थ जीवन दर्शन है, ये कैसे मैं समझाऊं,
रास्ते इनेक मंजिल है एक, ये मैं कैसे दिखलाऊं,
सबकी अपनी कोशिश है उस तक पहुँच पाने की,
सबकी कोशिश को देखो मैं सही रास्ता दिखलाऊं,
बहुत बधाई ।

Rohit Sharma said...

Good poem....I dont say that I know a lot about hinduism...But your poem
seems to capture the very essence behind it...Nice work...

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब लिखा है, नफरत के बढ़ते इस माहौल में, इस लेखन की बहुत आवश्यकता है ! शुभकामनायें !

अपर्णा "पलाश" said...

हिन्दुस्तानी है वो , जो हिन्द की सन्तान है
हिन्दुस्तानी है वो , जो हिन्द की शान है
हिन्दुस्तानी है वो , जिसे हिन्द पर गुरूर है
हिन्दुस्तानी है वो , जिसे हिन्द पर गुमान है
हिन्दुस्तानी है वो , जिसकी सासों में हिन्द का राग है
हिन्दुस्तानी है वो , जो हिन्द पर अभिमान है

rajat chaudhary said...

So many followers .....you are going fast ....!!!! great to see.