my writings

Friday, October 05, 2007

जीवन का भंवर........


फ़ंस से गए हैं,जीवन के इस भंवर में हम कितना,
ना रहना चाहे इसमे, ना ही चाहे इससे निकलना,
अगर रहना चाहे इसमे, तो पड़े जीवन के थपेड़े यहाँ,
अगर निकलना चाहे,तो है मजबूरियों का समंदर,
सामने खड़ी हैं, जिम्मेदारियां घड़ियाल की तरह,
बेबसी ऎसी, कि पहचान मिट रही है खुद के वजूद की,
रहना ही पसंद, क्योंकि निकलकर तो ड़र है डूब जाने का,
जीवन तो है, भवंर में जीने का भ्रम तो बना ही हुआ है,
अलग कुछ नहीं चाहे हम, बने हुए ही रास्तो पर चलना पसंद हमें,
ना बनाते कभी,नया रास्ता जिस पर दुनिया चलना चाहे,
नहीं सोचते हम कभी, कुछ प्रयास ही तो बनाते हैं वजूद को,
नहीं कोशिश करते, कभी हम भवंर से निकलने की,
निकलकर डूब भी गए तो क्या, जब एक दिन ड़ूबना है ही,
अलग पहचान रह जाएगी, भवंर से भी निकल पायेंगे हम,
ढोयेंगे नहीं फ़िर, जियेगें हम इस जीवन को…………………


सचिन जैन

1 Comments:

Anonymous dhruv said...

wah ustad.......cool h.......bole to jakas...........lage raho badhe bhai...........

11:11 AM  

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